नज़र के झरोके मे होकर... दिल के उस पालने मे झूलकर
सुकून कितना मिलता था... जब सुबह का सूरज मा की आँखो मे दिखता था
......
जगह जगह बिखरी रहती थी रंगोली... जब आँगन मे आ जाती थी संजोली
देर सवेर उठते थे... गाते थे गाना... इचक दाना इचक दाना
......
मा कहती थी
बोहुत हुआ ये शोर... अब कम अपनी आवाज़ करो... चलो जाकर अपना काम करो
पर हम मे भी थी हट इतनी की रूठ जाएँगे पर बाज़ ना आएँगे...
........
मा कहती थी
अब तो पड़ लो संध्या हो गयी नंद लाला... मन खूब लगाते थे विद्या अर्जन मे
पर उड़ती पतंग को देख फिर मन इठलाता था... और शाम का सूरज यूही ढल जाता था
रात को सुनाती थी मा लोरी.... हम कहते थे मा और एक स्टोरी...
सच सब कितना प्यारा सहारा था
.........
वो मौसम का बदलना अब क्यू नही रास आता, यू आँधी का निकलना क्यू सावन नही लाता...
इस आधुनिकता मे क्यू खो गए इतना... की जो अपने थे वो भी रह गए दूर कितना...
........
पर आज भी ये सैलाब यश तक नही पहुचा... बस सपनो का मंज़र है जो किसी ने नही सोचा
अब तो खुद को रोक लो ... जो ग़लती की वो सोच लो ...
..........
किनारा अभी दूर नही... मझधार मे संकोच नही...
ये तूफान से पहले का सन्नाटा है कोई खुशहाली का संकेत नही
सुकून कितना मिलता था... जब सुबह का सूरज मा की आँखो मे दिखता था
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जगह जगह बिखरी रहती थी रंगोली... जब आँगन मे आ जाती थी संजोली
देर सवेर उठते थे... गाते थे गाना... इचक दाना इचक दाना
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मा कहती थी
बोहुत हुआ ये शोर... अब कम अपनी आवाज़ करो... चलो जाकर अपना काम करो
पर हम मे भी थी हट इतनी की रूठ जाएँगे पर बाज़ ना आएँगे...
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मा कहती थी
अब तो पड़ लो संध्या हो गयी नंद लाला... मन खूब लगाते थे विद्या अर्जन मे
पर उड़ती पतंग को देख फिर मन इठलाता था... और शाम का सूरज यूही ढल जाता था
रात को सुनाती थी मा लोरी.... हम कहते थे मा और एक स्टोरी...
सच सब कितना प्यारा सहारा था
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वो मौसम का बदलना अब क्यू नही रास आता, यू आँधी का निकलना क्यू सावन नही लाता...
इस आधुनिकता मे क्यू खो गए इतना... की जो अपने थे वो भी रह गए दूर कितना...
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पर आज भी ये सैलाब यश तक नही पहुचा... बस सपनो का मंज़र है जो किसी ने नही सोचा
अब तो खुद को रोक लो ... जो ग़लती की वो सोच लो ...
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किनारा अभी दूर नही... मझधार मे संकोच नही...
ये तूफान से पहले का सन्नाटा है कोई खुशहाली का संकेत नही

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