कलम के कदम बहके है.. तो समझा हू
बिखरी बिखरी सिल्वटो की ... रेशम मैं उलझा हू
मुस्कुराते हुए हमने भी तो तुमको सिला दी है ...
कसूर ए गम का क्या जानू... नूरे प्रेम मैं जो उलझा हू
बिखरी बिखरी सिल्वटो की ... रेशम मैं उलझा हू
मुस्कुराते हुए हमने भी तो तुमको सिला दी है ...
कसूर ए गम का क्या जानू... नूरे प्रेम मैं जो उलझा हू

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