कोई अंतर नही दिखता... पर मैं पा भी नही सकता
कोई अंतर नही दिखता... पर मैं छू भी नही सकता
इलाही क्या ये शबब है... जो मैं चाह भी नही सकता
हमे तो भूल कर भी याद है... नूरे चहरा किसी का
मगर उस चहरे की नज़रो मैं... अपना अक्स बसा नही सकता
कोई अंतर नही दिखता... पर मैं छू भी नही सकता
इलाही क्या ये शबब है... जो मैं चाह भी नही सकता
हमे तो भूल कर भी याद है... नूरे चहरा किसी का
मगर उस चहरे की नज़रो मैं... अपना अक्स बसा नही सकता

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